आजकल हर जगह बस एक ही चर्चा है—AI आ गया है, नौकरियां चली जाएंगी, भविष्य क्या होगा? सच कहूँ तो, यह डर स्वाभाविक लगता है। लेकिन अगर हम थोड़ा ठहरकर सोचें, तो क्या हम वाकई एक सॉफ्टवेयर या मशीन से डर रहे हैं? या यह डर कहीं गहरा है?
शायद यह डर किसी तकनीक का नहीं, बल्कि हमारी 'पहचान' (Identity) के खो जाने का है। हमने मान लिया है कि हम 'वह' हैं जो हम काम करते हैं, या जैसा हमारा शरीर दिखता है। और जब इन पर आंच आती है, तो लगता है जैसे हमारा वजूद ही खतरे में है।
यहीं पर श्रीमद्भगवद्गीता का कालातीत ज्ञान हमें एक नई रोशनी दिखाता है। चलिए, इसे तीन आसान नजरियों से समझते हैं।
1. आप वो नहीं, जो आप समझते हैं (ज्ञान की दृष्टि)
गीता सबसे पहले हमारे उस भ्रम को तोड़ती है जिससे सारे डर पैदा होते हैं। वह कहती है— "तुम शरीर नहीं, चेतना हो।"
हम डरते क्यों हैं? क्योंकि हम खुद को शरीर, अपनी जॉब टाइटल या अपनी स्किल मान बैठे हैं। ये सब चीजें टेम्परेरी हैं, आज हैं, कल बदल जाएंगी। लेकिन आप? आप यानी 'चेतना' (Consciousness) तो परमानेंट है।
जब आप यह महसूस कर लेते हैं कि कोई भी AI आपकी आत्मा को कोड नहीं कर सकता और न ही आपकी चेतना को रिप्लेस कर सकता है, तो डर अपने आप गायब होने लगता है। बाहर चाहे तकनीक कितनी भी बदल जाए, भीतर आप स्थिर हैं।
2. जो हुआ ही नहीं, उससे क्यों डरना? (माया की दृष्टि)
हमारा आधा डर तो उन कहानियों से है जो हमारे दिमाग ने खुद गढ़ी हैं। "अगर मैं बेकार हो गया तो?", "अगर मेरी वैल्यू खत्म हो गई तो?"
गीता इसे ही 'माया' कहती है। माया का काम ही है—जो अभी हुआ नहीं है, उसका डर दिखाना। AI एक टूल है, लेकिन उसके चारों तरफ जो डर का माहौल है, वह एक भ्रम है। यह हमें यह भुला देता है कि हमारी असली ताकत हमारी 'स्किल' नहीं, हमारी 'आत्मा' है। भविष्य की चिंता में आज को खराब करना ही माया में फंसना है।
3. यह बस वक्त का एक नया खेल है (लीला की दृष्टि)
थोड़ा पीछे मुड़कर देखें। कभी बैलगाड़ी थी, फिर ट्रेन आई, फिर कंप्यूटर और अब AI। क्या जीवन रुक गया? नहीं।
गीता के नजरिए से देखें तो यह सब एक 'लीला' है—एक डिवाइन प्ले। रूप बदल रहे हैं, पर खेल वही है। AI इस ब्रह्मांडीय नाटक का बस अगला सीन है, कोई विलेन नहीं। जैसे हम सोचते हैं, वैसे ही यह तकनीक भी उसी चेतना की एक अभिव्यक्ति है। जब आप इसे एक खेल की तरह देखते हैं, तो आप इसके विरोधी नहीं, बल्कि गवाह (Witness) बन जाते हैं।
निचोड़: असली डर क्या होना चाहिए?
दोस्तों, बात बहुत सीधी है।
डर तब लगता है जब हम खुद को 'रोल' मान लेते हैं।
निडर हम तब होते हैं जब हम खुद को 'आत्मा' मानते हैं।
AI भविष्य है, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन आप? आप उससे भी पहले थे और उसके बाद भी रहेंगे। इसलिए, AI से मत डरिए। अगर डरना ही है, तो इस बात से डरिए कि कहीं आप इस शोर में अपनी असली पहचान—अपनी आत्मा—को न भूल जाएं।
जब आप अपनी जड़ों (चेतना) से जुड़े रहेंगे, तो दुनिया की कोई भी टेक्नोलॉजी आपको हिला नहीं पाएगी।
तुम चेतना हो। और चेतना कभी रिप्लेस नहीं होती।