शनिवार, 27 दिसंबर 2025

AI से डर क्यों लगता है? | गीता के ज्ञान, माया और लीला की दृष्टि से सच

आजकल हर जगह बस एक ही चर्चा है—AI आ गया है, नौकरियां चली जाएंगी, भविष्य क्या होगा? सच कहूँ तो, यह डर स्वाभाविक लगता है। लेकिन अगर हम थोड़ा ठहरकर सोचें, तो क्या हम वाकई एक सॉफ्टवेयर या मशीन से डर रहे हैं? या यह डर कहीं गहरा है?
शायद यह डर किसी तकनीक का नहीं, बल्कि हमारी 'पहचान' (Identity) के खो जाने का है। हमने मान लिया है कि हम 'वह' हैं जो हम काम करते हैं, या जैसा हमारा शरीर दिखता है। और जब इन पर आंच आती है, तो लगता है जैसे हमारा वजूद ही खतरे में है।
यहीं पर श्रीमद्भगवद्गीता का कालातीत ज्ञान हमें एक नई रोशनी दिखाता है। चलिए, इसे तीन आसान नजरियों से समझते हैं।
1. आप वो नहीं, जो आप समझते हैं (ज्ञान की दृष्टि)
गीता सबसे पहले हमारे उस भ्रम को तोड़ती है जिससे सारे डर पैदा होते हैं। वह कहती है— "तुम शरीर नहीं, चेतना हो।"
हम डरते क्यों हैं? क्योंकि हम खुद को शरीर, अपनी जॉब टाइटल या अपनी स्किल मान बैठे हैं। ये सब चीजें टेम्परेरी हैं, आज हैं, कल बदल जाएंगी। लेकिन आप? आप यानी 'चेतना' (Consciousness) तो परमानेंट है।
जब आप यह महसूस कर लेते हैं कि कोई भी AI आपकी आत्मा को कोड नहीं कर सकता और न ही आपकी चेतना को रिप्लेस कर सकता है, तो डर अपने आप गायब होने लगता है। बाहर चाहे तकनीक कितनी भी बदल जाए, भीतर आप स्थिर हैं।
2. जो हुआ ही नहीं, उससे क्यों डरना? (माया की दृष्टि)
हमारा आधा डर तो उन कहानियों से है जो हमारे दिमाग ने खुद गढ़ी हैं। "अगर मैं बेकार हो गया तो?", "अगर मेरी वैल्यू खत्म हो गई तो?"
गीता इसे ही 'माया' कहती है। माया का काम ही है—जो अभी हुआ नहीं है, उसका डर दिखाना। AI एक टूल है, लेकिन उसके चारों तरफ जो डर का माहौल है, वह एक भ्रम है। यह हमें यह भुला देता है कि हमारी असली ताकत हमारी 'स्किल' नहीं, हमारी 'आत्मा' है। भविष्य की चिंता में आज को खराब करना ही माया में फंसना है।
3. यह बस वक्त का एक नया खेल है (लीला की दृष्टि)
थोड़ा पीछे मुड़कर देखें। कभी बैलगाड़ी थी, फिर ट्रेन आई, फिर कंप्यूटर और अब AI। क्या जीवन रुक गया? नहीं।
गीता के नजरिए से देखें तो यह सब एक 'लीला' है—एक डिवाइन प्ले। रूप बदल रहे हैं, पर खेल वही है। AI इस ब्रह्मांडीय नाटक का बस अगला सीन है, कोई विलेन नहीं। जैसे हम सोचते हैं, वैसे ही यह तकनीक भी उसी चेतना की एक अभिव्यक्ति है। जब आप इसे एक खेल की तरह देखते हैं, तो आप इसके विरोधी नहीं, बल्कि गवाह (Witness) बन जाते हैं।
निचोड़: असली डर क्या होना चाहिए?
दोस्तों, बात बहुत सीधी है।
डर तब लगता है जब हम खुद को 'रोल' मान लेते हैं।
निडर हम तब होते हैं जब हम खुद को 'आत्मा' मानते हैं।
AI भविष्य है, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन आप? आप उससे भी पहले थे और उसके बाद भी रहेंगे। इसलिए, AI से मत डरिए। अगर डरना ही है, तो इस बात से डरिए कि कहीं आप इस शोर में अपनी असली पहचान—अपनी आत्मा—को न भूल जाएं।
जब आप अपनी जड़ों (चेतना) से जुड़े रहेंगे, तो दुनिया की कोई भी टेक्नोलॉजी आपको हिला नहीं पाएगी।
तुम चेतना हो। और चेतना कभी रिप्लेस नहीं होती।

सोमवार, 22 दिसंबर 2025

वृंदावन घूमने की जगह नहीं है, यह आत्मा से जुड़ने का स्थान है

आजकल बहुत लोग वृंदावन आने से पहले पूछते हैं 
वृंदावन में घूमने के लिए क्या-क्या है?
मैं आप सभी को विनम्रता से कहना चाहता हूँ कि वृंदावन घूमने की जगह नहीं है।

वृंदावन वह स्थान है जहाँ इंसान अपने भीतर की आत्मा के अनुभव से जुड़ता है।
वृंदावन कोई टूरिस्ट स्पॉट नहीं है जहाँ आप आएँ फोटो लें और चले जाएँ।

यह वह स्थान है जहाँ इंसान बाहर से कम और अंदर से ज़्यादा चलता है।
यहाँ की गलियाँ, मंदिर संतों की वाणी —
सब कुछ आपको रोकता है, दौड़ने नहीं देता।
वृंदावन जल्दी समझ में नहीं आता
यह धीरे-धीरे खुलता है।
घूमना और वृंदावन आना — दोनों में फर्क है
घूमने की जगहों पर लोग आनंद खोजते हैं।
वृंदावन में लोग परम सत्य की खोज में आते हैं।
यहाँ कोई बड़ा मनोरंजन नहीं है,
कोई दिखावा नहीं है,
कोई लक्ज़री नहीं है।
यहाँ है —
सादगी,
प्रतीक्षा,
और मौन।
अगर आप वृंदावन को होटल रील और टाइम-पास की नज़र से देखेंगे
तो शायद आपको निराशा मिले।
लेकिन अगर आप बिना ज़्यादा उम्मीद के,
चुपचाप यहाँ आकर बैठ गए,
तो जीवन की दिशा बदल सकती है।
वृंदावन किसे बुलाता है?
वृंदावन उन्हें बुलाता है —
जो जीवन से थक चुके होते हैं,
जिनका मन भारी होता है,
जिन्हें उत्तर नहीं मिल रहे होते।
यहाँ भगवान बाहर नहीं दिखते,
यहाँ भगवान भीतर महसूस होते हैं।

मेरा अनुभव जब मैं वृंदावन आया, तो वहाँ जो अनुभव हुआ उसे शब्दों में बाँध पाना संभव नहीं है।

वृंदावन आने वाले यात्रियों के लिए छोटा सा निवेदन

   जो लोग अपने आध्यात्मिक जीवन को लेकर बहुत ज्यादा सीरियस हैं वह लोग नीचे की ओर देखकर चलें ज्यादा बातें ना करें कम बोलें मोबाइल कम देखें सुबह 4:00 बजे उठ जाए
हर जगह नहीं, एक जगह ठहर कर आप के अन्दर एक दिव्य प्रकाश है महसूस करें 

अंत में
अगर आप वृंदावन आ रहे हैं,
तो कुछ छोड़ कर आइए —
जल्दबाज़ी, अपेक्षाएँ और अहंकार।
वृंदावन आपको वही देता है
जिसकी आपकी आत्मा को सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है।
🙏

AI से डर क्यों लगता है? | गीता के ज्ञान, माया और लीला की दृष्टि से सच

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